मंदिरों में व्यवस्था के सुधार के लिये डेपुटेशन पर आये तहसीलदारों को हटाने की मांग
हिमाचल प्रदेश में सरकारी नियंत्रण वाले मंदिरों से राजस्व विभाग से डेपुटेशन पर आये तहसीलदारों को हटाने की मांग इन दिनों जोर पकडने लगी है। हालांकि पिछली भाजपा सरकार ने इन्हें वापिस उनके महकमें में ही भेजने का फैसला लिया था। लेकिन सरकार बदलते ही निर्णय ठंडे बस्ते में पड गया है। लोगों की नजर सीएम सुखविन्दर सिंह सुक्खू सरकार के बाकी बचे कार्यकाल पर है। चूंकि सरकार तीन साल में इस मामले में एक कदम भी आगे नहीं बढ पाई है।
दरअसल, प्रेम कुमार धूमल के कार्यकाल के दौरान बनी राणा कश्मीर सिंह समिति की सिफारिशों में अहम तौर पर मंदिरों से राजस्व महकमे के दखल को खत्म करने ही बात प्रमुख तौर पर थी। बकौल समिति मंदिर भाषा विभाग विभाग के अधीन आते हैं लिहाजा उनमें भाषा विभाग से ही लोग मंदिर अधिकारी के तौर पर तैनात होने चाहियें। इससे मंदिरों का प्रबंधन बेहतर हो सकेगा। व जवाबदेही तय हो सकेगी।
राणा समिति ने अपनी सिफारिश में कहा है कि मंदिरों में तहसीलदार स्तर के अधिकारी अपनी सेवाएं बेहतर तरीके से नहीं दे पाये हैं। चूंकि राजस्व महकमें में काम करने वाले तहसीलदार के पास मानव संसाधन का कोई तुर्जबा नहीं होता।
काबिलेगौर है कि हिमाचल प्रदेश में 52 छोटे बड़े हिन्दू मंदिर प्रदेश सरकार के नियंत्रण में हैं। जिनमें ज्वालामुखी ,चिंतपूर्णी, बाबा बालक नाथ , ब्रजेश्वरी देवी कांगडा, चामुंडा नंदिकेश्वर धाम व शाहतलाई प्रमुख हैं। जिनकी सालाना आमदनी करोड़ों में है। इन मंदिरों में बड़ी तादाद में कर्मचारी तैनात किये गये हैं, जिन्हें संभालना आसान काम नहीं है। यही नहीं मंदिरों में चढ़ने वाला चढ़ावा भी कम नहीं है। कहा जा रहा है कि तहसीलदार का तो आधा समय इस चढ़ावे को गिनने में ही चला जाता है। यही वजह है कि राणा समिति ने राज्य सरकार से सिफारिश की थी कि मंदिरों में रिटायर्ड एच ए एस अधिकारी लगाये जायें जिनका सेवाकाल बेहतर रहा हो वह लोग मूर्ति पूजा में विश्वास रखते हों।
दरअसल सरकारीकरण के समय तहसीलदार नियुक्त करने के पीछे प्रमुख कारण यह था कि मंदिरों की जमीन का रखरखाव सही ढंग से हो पाये। मंदिरों की जमीन पर हुए अवैध कब्जों को मुक्त करा दिया जाये।
दरअसल हिमाचल प्रदेश के कांगडा चामुंडा व ज्वालामुखी मंदिरों की हजारों एकड़ जमीन पर आज भी लोग कुंडली मारे बैठे हैं। लेकिन मंदिर अधिकारी कुछ भी नहीं कर पाये हैं। अकेले जिला कांगड़ा के डमटाल के राम गोपाल मंदिर की ही करीब पांच हजार कनाल जमीन है जो या तो आज मुजारों के पास है लोगों ने इस पर अवैध कब्जे कर रखे हैं। इसके एक बहुत बड़े हिस्से पर तो स्टोन क्रशर चल रहे हैं। मंदिर की ही कुछ जमीन गुरदासपुर में है। यही हाल दूसरे मंदिरों का है। तहसीलदार किसी भी मंदिर की जमीन को अवैध कब्जों से मुक्त नहीं करा पाये । जिससे अब तहसीलदार के डेपुटेशन पर नियुक्ति का विरोध होने लगा है। लेकिन हालात तो यह हैं कि कई जगह व्यापक विरोध के बाद भी मंदिरों से तहसीलदार जाना नहीं चाहते।
राणा समिति ने अपनी सिफारिश में साफ तौर पर इन जमीनों को छुड़ाने की वकालत की थी। यही नहीं पौंग झील में जो मंदिर पानी में समा गये थे। उनका मुआवजा आज भी इस्तेमाल नहीं हो पाया है। उसे प्रदेश के छोटे मंदिरों के लिये देने की बात थी। ताकि वहां पूजा अर्चना आसान हो सके।
अब प्रदेश के कई सामाजिक संगठन सरकारी नियंत्रण वाले मंदिरों के लिये अलग नीति बनाने व इन्हें एक विभाग के आधीन लाने की मांग राज्य सरकार से कर रहे हैं। दलील दी जा रही है कि मन्दिरों के लिये अलग नीति बनने से न केवल समस्याओं में सुधार आयेगा बल्कि श्रद्घालुओं को भी राहत मिलेगी। वहीं चढ़ावे में बंटवारे के प्रावधान को भी खत्म करने की बात हो रही है। लोग मौजूदा व्यवस्था दोषपूर्ण मानते है। जिससे मंदिरों में सरकारी दखल बढ़ता जा रहा है।